1985 बिजनौर उपचुनाव: जब हारकर भी ‘जीत’ गई थी 27 साल की लड़की, फिर बनी देश की पहली दलित महिला CM

1985 बिजनौर उपचुनाव: जब हारकर भी 'जीत' गई थी 27 साल की लड़की, फिर बनी देश की पहली दलित महिला CM 1

लखनऊ
वह दिसंबर 1985 का वक्त था, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश में उपचुनाव हो रहे थे।

पश्चिम यूपी में दिसंबर की ठंड में भी सियासी तपिश मालूम हो रही थी।

कैराना के अल दरमियां इलाके में एक 27 साल की लड़की सलवार सूट पहने साइकल के पीछे कैरियर में बैठकर चुनाव प्रचार कर रही थी।

उनका एक समर्थक साइकल चला रहा था।

वह इशारा करती, साइकल रुकती, फिर वह सड़क किनारे ही किसी के साथ बैठकर खाना खाती, युवाओं-बुजुर्ग से बात करती और फिर साइकल बढ़ाकर दूसरे इलाके में चली जाती।

इस कहानी में दो तस्वीरें हैं, पहला कि उस दौर में चुनाव प्रचार बेहद साधारण और बिना लाव लश्कर के होते थे।

दूसरा कि हम जिस लड़की की बात कर रहे हैं वह यह चुनाव हार गई थी लेकिन फिर भी अपने आक्रामक चुनाव प्रचार और उत्तेजक भाषण से उन्होंने सत्ताधारी दल कांग्रेस को भारी टेंशन दे दी थी।

नतीजों के बाद चारों ओर उनकी चर्चा थी।

हम बात कर रहे हैं मायावती की।

मायावती के सामने थे पासवान और मीरा कुमार
बिजनौर से कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद गिरधर लाल के निधन के बाद यह सीट खाली हुई थी।

एससी आरक्षित सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने दलित पोस्टर बॉय बाबू जगजीवन राम की बेटी मीरा कुमार को टिकट दिया था जो विदेश सेवा की नौकरी छोड़कर आई थीं।

उनके सामने थे तब लोक क्रांति दल (एलकेडी) के नेता रामविलास पासवान जिन्होंने बिहार के हाजीपुर सीट पर रेकॉर्ड मतों से चुनाव जीता था।

इन दोनों के सामने थीं निर्दलीय उम्मीदवार मायावती, जो अपना पहला चुनाव लड़ रही थीं।

पूरे देश में कांग्रेस के प्रति थी सहानुभूति की लहर
मायावती उस समय तक बहुजन समाज पार्टी की सदस्य थीं लेकिन चुनाव आयोग ने उन्हें उपचुनाव में निर्दलीय के रूप में रजिस्टर किया था क्योंकि उनकी पार्टी शुरुआती दौर में थी।

अप्रैल 1984 में पार्टी का गठन हुआ था।

जयब्रत सरकार की पॉलिटिक्स ऐज सोशल टेक्स्ट इन इंडिया: द बहुजन समाज पार्टी इन उत्तर प्रदेश किताब में इस चुनाव का जिक्र है।

इसमें लिखा है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निधन के बाद पूरे देश में कांग्रेस के प्रति सहानुभूति की लहर थी।

1985 उपचुनाव में कांग्रेस को लग रहा था कि सहानुभूति फैक्टर के चलते उसे आसानी से जीत मिल जाएगी लेकिन कांग्रेस के हाथ से यह मौका छीनने के लिए बीएसपी की रणनीति साफ थी।

बीएसपी का यह रुख एलकेडी सदस्य राम विलास पासवान के पक्ष में जा रहा था।

अपने उत्तेजक भाषणों से चर्चा में आ गई थीं मायावती
किताब में लिखा है कि मायावती बिजनौर निर्वाचन क्षेत्र में पिछले छह महीने से दौरा कर रही थीं और चुनाव आते-आते उनके भड़कीले भाषणों ने सुर्खियां बटोर ली थीं।

मायावती की लोकप्रियता बढ़ती देख कांग्रेस मुश्किल में घिर रही थी।

आसानी से जीता जाने वाला चुनाव एक वक्त कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का चुनाव बन गया था।

हालांकि कांगेस के चुनावी रणनीतिकारों ने मौका नहीं छोड़ा और लगातार प्रचार किया।

‘दलित विमर्श का नया दौर शुरू हुआ था’बिजनौर टाइम्स के संपादक सूर्यमणि रघुवंशी उस उपचुनाव के बारे में बताते हैं, ‘मायावती के भाषण बहुत तीखे हुआ करते थे।

शब्दावली अटपटी थी।

दलित विमर्श का नया दौर शुरू हुआ था।

मायावती नई राजनीति के रूप में आई थीं और अपने शब्दों को लेकर चर्चा में आ जाती थीं।

जातीय उन्माद पैदा करने वाले भाषण थे।

उनके सामने थे रामविलास पासवान और मीरा कुमार।

दोनों ही बिहार से थे।

‘ वह आगे बताते हैं, ‘हाई प्रोफाइल चुनाव हुआ था।

एक ओर मीरा कुमार के समर्थन में तत्कालीन सीएम वीर बहादुर सिंह थे।

उन्होंने चुनाव प्रचार के लिए पूरी फौज दो-तीन दिन बिजनौर में उतार दी थी।

वहीं पासवान के समर्थन में चुनाव में प्रचार करने के लिए मुलायम सिंह यादव, शरद यादव समेत कई नेता बिजनौर में कई दिन तक डेरा डाले रहे थे।

‘ सूर्यमणि बताते हैं कि मायावती राजनीति में नई थीं।

लिहाजा चुनाव प्रचार में उनका उत्साह और मेहनत दिखती थी।

वह साइकल के कैरियर पर बैठकर चुनाव प्रचार करती थीं।

गांव-गांव जाती थीं।

दलितों के बीच खाना खाती थीं।

कांटे के मुकाबले में जीत मिली मीरा कुमार को
कांटे के मुकाबले में मीरा कुमार को महज 5,346 वोट से जीत मिली थी।

इस रोमांचक चुनाव में मीरा कुमार 1,28,101 मत लेकर विजयी हुई थीं।

रामविलास पासवान को 1,22,755 वोट मिले थे।

इस चुनाव में सबसे चौंकाने वाला परिणाम मायावती का था।

दिग्गजों की दौड़ में मायावती ने 61,506 मत हासिल किए थे और वह तीसरे स्थान पर रहीं थीं।

उन्हें एससी और मुस्लिम समुदाय के 18 फीसदी वोट मिले थे।

बिजनौर आरक्षित लोकसभा क्षेत्र में उस वक्त 39 फीसदी आबादी मुस्लिम थी जबकि 23 फीसदी आबादी अनुसूचित जाति की थी जिनमें से 20 फीसदी चमार जाति से ताल्लुक रखते थे।

मायावती ने मायावती ने अनुसूचित जाति के महत्वपूर्ण वर्गों को लामबंद किया था वहीं शाहबानो प्रकरण से मुस्लिम वोट शेयर घटने से पार्टी में असुरक्षा की भावना पैदा हो गई थी।

‘जब लोगों ने जाना कि मायावती भी कोई शख्सियत हैं’वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ल बताते हैं,’देश की राजनीति बदल रही थी, बीएसपी धीरे-धीरे जड़ें जमाने लगी थी।

इस चुनाव में एक ओर इंदिरा के खास जगजीवन राम की बेटी मीरा कुमार थीं तो दूसरी ओर रामविलास पासवान, जो दलित राजनीति के आक्रामक नेता थे।

बिहार से चुनाव जीतते थे।

उनके सामने मायावती बिल्कुल नई थीं।

ऐसे में 61,000 वोट पाना छोटी बात नहीं थी।

‘ वह आगे बताते हैं, ’85 के उपचुनाव में लोगों ने पहली बार जाना कि मायावती भी एक शख्सियत हैं।

बड़ा रोचक चुनाव हुआ था।

एक वह दौर था जब बसपा धीरे-धीरे ऊपर आ रही थी।

अगले चुनाव में वह बिजनौर से सांसद चुनी गईं और फिर 1995 में देश की पहली महिला दलित सीएम।

मायावती ने जब सीएम पद की शपथ ली तब तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने इसे लोकतंत्र का चमत्कार कहा था।

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